कारगिल युद्ध के शेर कैप्टन विक्रम बात्रा, जिन्होंने कहा मैं तिरंगा फहरा कर लौटूंगा या तिरंगा में लिपट कर आऊंगा...

 
मैं तिरंगा फहरा कर लौटूंगा
या तिरंगे में लिपट कर आऊंगा
लेकिन वापस आऊंगा जरूर

                                                  -कैप्टन विक्रम बत्रा 



कैप्टन विक्रम बत्रा, PVC (9 September 1974 – 7 July 1999) भारतीय सेना के एक अधिकारी थे, जिन्हें 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनके बहादुरी के लिए परमवीर चक्र, भारत के सर्वोच्च और सबसे प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

भारतीय इतिहास पर्वतीय युद्ध में सबसे कठिन अभियानों में से एक का नेतृत्व किया। पाकिस्तानी सेना के अवरोधन किए गए संदेशों में उन्हें अक्सर 'शेर शाह' कहा जाता था।

कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने जीवन की शुरुआत 6 दिसंबर 1997 को भारतीय सेना की 13 जम्मू कश्मीर राइफल से की थी। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे विक्रम बत्रा की कमांडो ट्रेनिंग खत्म होते ही उनकी तैनाती कारगिल युद्ध क्षेत्र में कर दी गई। 

1 जून 1999 को अपनी यूनिट के साथ लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा ने दुश्मन सेना के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। 

बहादुर लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा नियुक्ति के तुरंत पश्चात ही दुश्मनों को धूल चटाकर,  हम्प् व रॉक नाब की चोटियों पर कब्जा जमा लिया था, लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा की बहादुरी को देखते हुए सेना मुख्यालय ने उनकी पदोन्नति करते हुए लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा से "कैप्टन विक्रम बत्रा" बना दिया। 

श्रीनगर लेह मार्ग के बेहद करीब स्थित 5140 पॉइंट को दुश्मन सेना से मुक्त करवाकर भारतीय ध्वज फहराने की जिम्मेदारी कैप्टन बत्रा को दी गई जिसे उन्होंने,  अपने अद्भुत पराक्रम एवं कौशल बुद्धि का परिचय देते हुए 20 जून 1999 की सुबह करीब 3:30 बजे इस पॉइंट पर अपना कब्जा जमाया एवं सभी भारतीयों का सीना चौड़ा कर दिया, इस पॉइंट पर भारतीय पताका फहराने के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भेजे गए संदेश ने उन्हें देश में नई पहचान दिलाई यह संदेश था "दिल मांगे मोर"


कठिन चुनौतियों को आसानी से मात देने वाले कैप्टन विक्रम बत्रा को एक नई चुनौती का सामना करना था, यह चुनौती अनुज नय्यर और लेफ्टिनेंट नवीन एवं अन्य साथियों के साथ लड़ना था । आतंकियों की देश में मौजूद पाकिस्तानी सेना से आमने सामने की लड़ाई कई दिनों तक जारी रही,  दोनों तरफ लगातार गोलियों की बौछार जारी थी। आतंकी रूपी पाकिस्तानी सेना गोलियों का जोरदार प्रहार किए जा रही थी, 

 दुश्मन सेना पाकिस्तानी ने लेफ्टिनेंट नवीन के पैरों में गोली चला दी, जिसकी वजह से लेफ्टिनेंट नवीन दर्द से कराह रहे थे, इसी का फायदा उठाते हुए दुश्मनों ने लेफ्टिनेंट नवीन को निशाना बनाते हुए लगातार फायरिंग करना शुरू कर दिया। अपने महत्वपूर्ण साथी की जान बचाने के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा दौड़ पड़े लेफ्टिनेंट को खींच कर ला ही रहे थे तभी दुश्मन की एक गोली उनके सीने पर आ लगी । 

वीर जवान कैप्टन विक्रम बत्रा ने अंतिम वक्त तक दुश्मनों की काल बनकर मैदान में डटे रहे, गोली सीने में लगने के कारण शरीर लहूलुहान हो गया था बहादुर कैप्टन विक्रम बत्रा ने भारत "माता की जय" का उद्घोषणा किया। एवं वीरगति को प्राप्त हो गए। 

कैप्टन विक्रम बत्रा के अदम्य साहस एवं पराक्रम के लिए 15 अगस्त 1999 को उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया l






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